दरअसल ये 'वजूद' की लड़ाई है
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई के सभागार में उस समय सन्नाटा छा गया, जब उसने अपनी कहानी सुनाना शुरू किया. वह वंचित तबकों के सामने आ रही चुनौतियों पर बात रखने आई थीं. जब तक उसने बोलना शुरू नहीं किया था, तब तक उसे ज्यादा तवज्जो नहीं मिली थी, लेकिन जैसे-जैसे उसने बोलना शुरू किया, वैसे-वैसे समाज के उजले पक्ष की कड़वी हकीकत सामने आने लगी. एक ओर तो वह तीसरे लिंग के साथ हो रहे समाज के उपेक्षापूर्ण रवैये को बता रही थी तो दूसरी ओर वह ट्रेफिकिंग के अपने अनुभव को भी साझा कर रही थीं. उसका नाम डायना है, वह गोवा से आई थी.
वह पुराना नाम नहीं बताना चाहती है, कहती है क्या करेंगे जानकर. चाय के ब्रेक में वह मुझसे एक ओर जाकर बात करती है, आप यूं कह लें कि साक्षात्कार के लिए. बहुत ही गंभीरता से बात शुरू ही होती है कि कुछ प्रतिभागी आकर उसके साथ सेल्फी खिंचाना चाहते हैं. डायना एकदम मुस्कुराकर फोटो खिंचाती है. लौटकर बोलती है प्राब्लम तो अपनी है, तो फिर इन्हें क्यों अपना रोतला चेहरा दिखायें. मैं उसकी ओर गौर से देखता हूँ, जैसे उसके जीवन की धूप छांव को समझना चाहता हूँ लेकिन वो कहती है, आगे बढ़ें. बहरहाल बात शुरू होती हैं उसके बचपन से. वह कहती है कि जिस दिन मुझे लगा कि मैं लड़की हूँ, और मैंने यह बात अपने परिवार वालों से कही, ठीक उसी दिन से प्रताड़ना का अंतहीन सिलिसिला शुरू हो गया. कोई अकारण, कभी भी मारता. पापा तो मुझसे चिढ़ गए थे. ताने तो हर बात पर मिलते. एक दिन मुझसे सभी ने पूछा, तुम चाहते क्या हो, मैंने कह दिया आई वांट टू बी ए गर्ल. यह कहना नागवार गुजरा. प्रताड़नाएं अप्रत्याशित रूप से बढ़ गईं. स्कूल में भी दोस्तों ने ही मजाक बनाना शुरू कर दिया था.
कोई यह समझना ही नहीं चाहता था कि मैं क्या चाहती हूँ, मैं कौन हूँ, बल्कि हरेक व्यक्ति अपनी ही बात में लगा था. इसके बाद तो कई बार मेरा घर में ही यौन शोषण हुआ. किसने किया. थोड़ी देर रूकती हैं, फिर कहती है पता नहीं ....(शायद बताना नहीं चाहती है). मारपीट, ताने और बलात्कार, तंग आ गई थी मैं. एक दिन सोचा कि अब इस घर में और नहीं, निकल गई बाहर. कहाँ जाउंगी, पता नहीं!, क्या करुंगी, पता नहीं!, कैसे रहूंगी, पता नहीं!, पता था तो केवल इतना कि खुली हवा में सांस लेना है और जीना है अपनी जिंदगी. वास्को स्टेशन पर सात दिन रही. पर जल्द ही समझ आ गया कि यह दुनिया और इसकी हवा जितनी साफ़ दिखती है, उतनी है नहीं. यहाँ पर मेरा चार बार बलात्कार हुआ. एक दिन हिजडों की टोली यहाँ से सब्जबाग दिखाकर ले गई. पुणे था नया ठिकाना. पहले कहते रहे कि कुछ और काम करेंगे लेकिन एक दिन कहा कि हम लोग होकर जायेंगे पिकनिक, लेकिन लाकर बैठाया एक नाके पर और काम था भीख मांगना. बहुत रोई, फिर संभली लेकिन इसके बाद से फिर कभी रोई नहीं. यहीं पर पहली बार औपचारिक रूप से ताली बजाना सीखा. कुछ दिन इन्तजार किया, सही वक्त आने पर भाग निकली वहां से हमेशा-हमेशा के लिए.
वापस गोवा आ गई. घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए. हर दिन मरना, हर दिन जीना शुरू हो गया. नाजों से पली मैं एक रोटी के टुकड़े और एक जोड़ी कपड़ों के लिए तरस गई. जिंदगी अपना सही असर दिखाने लगी थी. भूख सब कुछ करा देती है. क्लब में गई गाना गाने लेकिन वहाँ मुझसे कहा ग्या कि दैहिक शोषण के लिए तैयार हो जाओ. मना किया, लेकिन धीरे-धीरे उतर ही गई एक दिन दैहिक शोषण के धंधे में. महीनों चला यह सब कुछ. घर वाले भी गोवा में ही रहते, लेकिन वो मुझसे मिलते नहीं. मैं उनके लिए उसी दिन मर गई, जिस दिन मैंने उन्हें यह बताया था कि मैं लड़की होना चाहती हूँ.
इस नरक से गुजरते हुए कहा एक दिन सोचा कि डायना तुम इस धरती पर इस दिन के लिए तो नहीं आई थीं. तुम्हें कुछ और करना है. बस उसी दिन से उस नरक से बाहर आ गई. एक बार फिर से संघर्ष शुरू हुआ. वास्तविक संघर्ष. एक एनजीओ से सहारा दिया. नौकरी की. एड्स पर काम था. अपने ही समुदाय के और करीब जाने का मौका मिला. थोड़ा नाम भी कमाया. एक दिन यह भी लगा कि यह केवल खाने, कमाने, जीने, मरने की लड़ाई नहीं है बल्कि दरअसल यह तो वजूद की लड़ाई है. एक संस्था बनाई और उसका नाम रखा 'वजूद'. इस संस्था के साथ मेरे जैसे 35 साथी और हैं.
इस संस्था के तहत हम लोगों से बात करते हैं, उन्हें संवेदनशील बनाते हैं, हमारे मुद्दों से परिचित कराते हैं. हम उन्हें आपके दिए शब्दों से परिचित करते हैं और कहते हैं कि आपके ये शब्द हमें मारते हैं, ये छुरी की तरह वार करते हैं. हम विद्यार्थियों के पास जाते हैं कालेज में, हम अधिकारियों के पास जाते हैं, हम हर उस समूह के पास जाते हैं जो हमारे 'वजूद' को नकारते हैं. कभी अपनी बातों से, कभी अपने कामों से. इसलिये भी मैं आपके पास आई हूँ, अपनी बात रखने.
एक प्रतिभागी ने पूछ लिया कि अब तो आप लोगों को अन्य (ओ) का दर्जा मिल गया. इससे आपके जीवन में क्या परिवर्तन आया? ओ स्टेट्स मिला, अच्छी बात है. पर इससे रोटी नहीं मिलती, इससे इज्जत नहीं मिलती. मैं काम करना चाहती हूँ, मैं पढ़ाना चाहती हूँ, मैं सम्मानजनक जिंदगी जीना चाहती हूँ, पर यह सब कुछ यह “ओ” स्टेट्स नहीं देता है. इसके लिए दिमाग के जाले साफ़ करके हमें अपनाने की जरुरत है, जिसके लिए अधिकांश लोग तैयार नहीं. हमारे लिए लाये जाने वाला विधेयक भी चर्चा में हैं लेकिन सवाल क्रियान्वयन का है क्योंकि यह समाज की समस्या है. संविधान ने तो मुझे भी उतने ही अधिकार दिए हैं जितने कि आपको हैं, लेकिन फिर इनसे मरहूम क्यों..? यह सवाल हर वक्त जिंदा रहता है ज़ेहन में.
मेरे इस सवाल के जवाब में कि डायना क्या चाहती है. वह तपाक से बोलती है केवल तीन बातें. अव्वल तो यही कि आप सभी को हमसे डरने की जरुरत नहीं. दूसरा, हमें स्वीकारना होगा आपको. तीसरा, अपने बच्चों को केवल इसलिये सड़कों पर मत फैंक दो क्योंकि वो तुम्हारे पारंपरिक लिंग के खांचे में फिट नहीं बैठते हैं. उन्हें सुनिए, उनसे बात करिये. हमें रहने के लिए तुम्हारी कालोनी में जगह चाहिए. हमें काम करने के लिए मौके चाहिये. जिस दिन यह तीन बातें हो जायेंगी, हमारा वजूद भी स्वतः स्थापित हो जाएगा.
फिर (थोड़ रुक कर) बोलती है कि आपके माँ-बाप हैं. मैं झट से हां कहता हूँ, वह कहती है कि काश, सभी के लिए इतना आसान हो यह कह पाना.... मैं भी यह कह पाती कि मेरे माँ-बाप हैं. मेरे मां-बाप हैं तो, लेकिन मैं उनसे मिल नहीं सकती, उन्हें चाहकर भी गले नहीं लगा सकती, उनके गले नहीं लग सकती. वो बाज़ार में मुझे देख लेते हैं तो भी वे नजरें चुराते हैं. मुंह फेर लेते हैं. उनका लड़का अब लड़की जो हो गया है. मेरी नजर में तो वह अपने मन की सुनने लगा है. मैंने कहा न आपसे, “दरअसल ये वजूद की लड़ाई है.”
फिर (थोड़ रुक कर) बोलती है कि आपके माँ-बाप हैं. मैं झट से हां कहता हूँ, वह कहती है कि काश, सभी के लिए इतना आसान हो यह कह पाना.... मैं भी यह कह पाती कि मेरे माँ-बाप हैं. मेरे मां-बाप हैं तो, लेकिन मैं उनसे मिल नहीं सकती, उन्हें चाहकर भी गले नहीं लगा सकती, उनके गले नहीं लग सकती. वो बाज़ार में मुझे देख लेते हैं तो भी वे नजरें चुराते हैं. मुंह फेर लेते हैं. उनका लड़का अब लड़की जो हो गया है. मेरी नजर में तो वह अपने मन की सुनने लगा है. मैंने कहा न आपसे, “दरअसल ये वजूद की लड़ाई है.”
कुछ और छूट तो नहीं गया डायना, तो बोली यह जरूर कहना चाहती हूँ कि आज भी मैं रोज वाक्सो स्टेशन पर जाती हूँ, चाय पीती हूँ, बैठती हूँ वहाँ सभी के साथ गप्पे मार कर वापस आती हूं. मैंने सुना था कि जब ऊपर जा रहे हों तो आपके जीवन के पड़ावों को जरूर ध्यान रखिये क्योंकि ज़मीन नहीं भूलना चाहिए. फिर तो यह मेरे “वजूद” की लड़ाई है और मेरी इस लड़ाई में इन स्थानों की भी बड़ी भूमिका है. चाय खत्म हो जाती है. वो फिर से सभागार में है. कई जोड़ी आंखें फिर उसे घूर रही हैं.
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